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राम मंदिर : बीजेपी के लिये कुंआ तो कांग्रेस के लिये खाई..!


GAURAV SHUKLA 12/01/2019 18:13:01 174 Views


ram mandir article by k m jha

कृष्णमोहन झा/

(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है)

अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण की आस लगाए देश के लाखों साधु-संतों एवं रामभक्तों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से यह उम्मीद थी कि उनकी सरकार जल्द ही इसके लिए कोई अध्यादेश लाएगी या संसद के चालू सत्र में ही कोई विधेयक पेश करेगी। लेकिन पीएम ने यह साफ कर दिया है कि सरकार क़ानूनी प्रक्रियां पूरी हो जाने के बाद ही अध्यादेश जारी करने पर विचार करेगी। पीएम मोदी का कहना है कि अदालत की प्रक्रियां समाप्त होने के बाद सरकार की जो जिम्मेदारी होगी उसके लिए हम तैयार है। प्रधानमंत्री की इस स्वीकारोक्ति के बाद अयोध्या में जल्द राम मंदिर निर्माण होने की संभावनाओं को विराम लग गया। 

 

दरअसल मोदी सरकार से यह अपेक्षा की जा रही थी कि वे ट्रिपल तलाक पर लाए गए अध्यादेश की भांति मंदिर निर्माण के लिए भी अध्यादेश जारी करेगी,  लेकिन प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है की दोनों मामलो में अंतर है। ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद केंद्र सरकार ने अध्यादेश जारी किया है और यह भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार ही जारी किया गया है, लेकिन अयोध्या का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए कोर्ट में क़ानूनी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद ही अध्यादेश लाने पर विचार किया जा सकता है। पीएम की इस दो टूक के बाद यह सवाल उठना भी स्वभाविक है कि अयोध्या में नवम्बर में आयोजित हुई साधु संतो की धर्मसभा में सरकार पर दबाव बनाने के पीछे आखिर क्या मकसद था।

 

गौरतलब है कि इस धर्मसभा में  मांग उठी थी कि सरकार अध्यादेश लाकर या संसद में विधेयक के जरिए मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करे। इसके बाद संसद के सत्र के पूर्व भी दिल्ली में एक यात्रा निकालकर मंदिर निर्माण  की मांग की गई थी । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भगवत ने भी इस मामले में सरकार से जल्द कदम उठाने की मांग की थी। यहां यह भी उल्लेखनीय हैं कि जिस समय अयोध्या में विशेष धर्मसभा का आयोजन किया गया था उसी समय शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अपने दो हजार शिवसैनिकों के साथ अयोध्या में रामलला की आरती में भाग लिया था। इसका भी उद्देश्य एक ही था कि राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार पर दबाव बनाया जा सके।  

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प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भाजपा ने चुनावी घोषणा पत्र में इस बात का उल्लेख किया था की इस मसले का निपटारा संवैधानिक तरीके से ही किया जाएगा। पीएम की इस स्वीकारोक्ति के बाद संत समाज मसोपेश में है कि अब सरकार पर दबाव कैसे बनाया जाए। अब मंदिर का निर्माण केवल तब ही प्रारंभ हो सकता है जब सुप्रीम कोर्ट में परिणाम अनुकूल हो। आगामी लोकसभा चुनाव अप्रैल और मई के दौरान कराए जा सकते है। तब तक सरकार के लिए इस मसले पर कोई भी नया कदम उठाना मुमकिन नहीं दिख रहा है। हालांकि अदालत के बाहर इस मसले का कई बार समाधान खोजने का प्रयास किया गया लेकिन कुछ हल नहीं निकल पाया है। अतः अब सभी को सुप्रीम कोर्ट के फैसले की ही प्रतीक्षा करनी होगी। इसके आलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। इधर प्रधानमंत्री और भाजपा यह आरोप भी लगाने से नहीं चूक रही है कि कांग्रेस ने पूर्व में कोर्ट में त्वरित सुनवाई के मामले में व्यवधान पैदा करने की कोशिश की है । इसीलिए मसले पर सुनवाई की गति धीमी पड़ी हुई थी। इधर लम्बे समय बाद 10 जनवरी को मामले की सुनवाई फिर शुरू हुई ,लेकिन मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन द्वारा संविधान पीठ और जस्टिस यु यु ललित पर सवाल खड़े करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अब 29 जनवरी तक टाल दिया है। इससे जल्द निर्णय की आस में बैठे लोगो को कुछ और इंतजार करने के लिए विवश होना पड़ा है। 

 

इधर अब सरकार से भी यह सवाल पूछा जाना स्वभाविक है कि  उसने साढ़े चार तक मामले के जल्द निपटारे के लिए कोई सक्रियता क्यों नहीं दिखाई। चुनाव के 6 माह पहले ही क्यों मंदिर निर्माण पर चहलकदमी दिखाई जा रही है। निश्चित रूप से आगामी लोकसभा में भाजपा यह मुद्दा गरमा कर कांग्रेस को कटघरें  खड़ा करना चाहती है। जवाब तो कांग्रेस को भी देना होगा कि पेशे से वकील उसके एक वरिष्ठ नेता ने किस मंशा से सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि इस मसले की सुनवाई लोकसभा चुनाव तक स्थगित की जाए। कांग्रेस को यह भी बताना ही होगा की इस मसले पर उसकी अब राय क्या है। 

 

पिछले कुछ महीनों से सॉफ्ट हिंदुत्व के प्रति झुकाव प्रदर्शित करने वाली कांग्रेस की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वह मंदिर मसले पर अपनी कोई स्पष्ट राय नहीं बना पाई है। अगर वह भी अयोध्या में जल्द मंदिर निर्माण को लेकर आवाज बुलंद करती है तो उससे भाजपा का पक्ष ही मजबूत होगा और यदि वह मौन साध लेती है तो भाजपा को उसपर वार करने का मौका मिल जाएगा। अब वस्तुस्थिति चाहे जो भी हो लेकिन  इतना तो तय है कि चुनावों तक यदि कोर्ट के द्वारा इस मुद्दे का निर्णय नहीं किया गया तो भाजपा एक बार फिर इस भावनात्मक मुद्दे पर चुनावी हित साधने की पूरी कोशिश करेगी।

Web Title: ram mandir article by k m jha ( Hindi News From Newstimes)


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