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फ्लैश बैक : 26 साल बाद बसपा-सपा हुई एक साथ, पढ़ें सफर


DEEP KRISHAN SHUKLA 12/01/2019 10:43:43 130 Views


LUCKNOW. सपा-बसपा का जो गठबंधन आज सुर्खियों में वह कोई नया नहीं है, 26 साल पहले कुछ ऐसा ही नजारा इटावा में देखने को मिला था। जहां बसपा संस्थापक कांशीराम उपचुनाव में पहली बार इटावा से सांसद बने थे। उनकी इस जीत में मुलायम सिंह यादव का बड़ा योगदान रहा था। आज एक बार फिर उसी अंदाज में दोनों दलों की दूसरी पीढ़ी एक साथ नजर आ रही है। दोस्ती से दुश्मनी और फिर दुश्मनी से दोस्ती में तमाम उतार-चढाव जनता को नुमाया करा चुके इन दोनों दलों का एक बार फिर से हुआ गठबंधन क्या रंग लाता है, यह देखने वाली बात होगी।

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  1993 में पहली बार गूंजा था 'मिले मुलायम कांशीराम' का नारा

बता दें कि 6 दिसंबर, 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद केंद्र सरकार ने तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया था। सियासत का यही वह दौर था, जब सपा-बसपा के बीच दोस्ती का रंग चढ़ा था। इस दौर में 'मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम' का नारा खूब चर्चित रहा। वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव में भी सपा-बसपा ने एक साथ चुनाव लड़कर सत्ता हथियाई थी। इस चुनाव में बसपा ने 164 व सपा ने 256 प्रत्याशी उतारे थे। बसपा ने 67 सीटें व सपा ने 109 सीटें जीत कर भाजपा को 177 सीटों पर सीमित कर दिया था। इन दोनों दलों के पिछड़े, अति पिछड़ा व मुस्लिम वोटों ने हिंदुत्व की लहर को काटने का काम किया। 

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  1995 में मायावती ने समर्थन वापस लेकर गिरा दी थी सरकार

बसपा को यह लगने लगा था कि सपा उनके सदस्यों को तोड़ रही है, जिसके चलते दोनों दलों में दूरियां बढ़ने लगीं, जिसका सरकार पर असर दिखने लगा। एक जून 1995 को लखनऊ का सियासी माहौल कुछ इस कदर गर्माया कि दोनों दल आमने—सामने आ गए। बसपा ने कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न व अपहरण कराने का आरोप कर समर्थन वापस ले लिया। मायावती उस समय बसपा की प्रदेश प्रभारी व पार्टी उपाध्यक्ष थीं। मीराबाई मार्ग स्थित राजकीय गेस्ट हाउस में मयावती पर सपा कार्यकर्ताओं ने हमला किया था। इस घटना के बाद से दोनों दलों के बीच जबरदस्त खटास बन गई थी।

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  बसपा के इतिहास पर एक नजर

पार्टियों के इतिहास के लिहाज से देखें तो बसपा, सपा से पुरानी पार्टी है। पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने 1984 में एक राजनीतिक दल के रूप में बहुजन समाज पार्टी का गठन किया। इससे पूर्व वह दलितों को जागरूक करने के लिए बामसेफ और दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) चला रहे थे। कांशीराम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी बनाया। मायावती ने हमेशा उन्हें सम्मान दिया, उसी की देन है कि उनके सम्मान में स्मारक भी बनवाया। मायावती एक बार अपने बूते तो तीन बार अन्य दलों की मदद से उत्तर प्रदेश की चार दफा मुख्यम़ंत्री रह चुकीं हैं।

अखिलेश यादव से पहले जोड़-तोड़ से ही सपा ने बनाई सरकार

मुलायम सिंह की सरकार जोड़तोड़ से ही चलती थी। 1989 में पहली बार मुलायम सिंह यूपी के मुख्यमंत्री बने। अप्रैल 1991 में कांग्रेस ने सरकार से समर्थन वापस लेने पर अल्पमत के चलते उनकी सरकार गिर गई थी। 1991 में मुलायम सिंह यादव की पार्टी चुनाव हार गई। इसके बाद मुलायम जनता परिवार से अलग हुए और 4 अक्टूबर, 1992 को लखनऊ में समाजवादी पार्टी का गठन किया। बसपा के साथ मिलकर अगला विधानसभा चुनाव लड़ा और सीएम बन गए। इसके बाद तीसरी बार भी वह मुख्यमंत्री बनें। 2012 में पहली बार पूर्ण बहुमत मिलने पर उन्होंने अपने बेटे अखिलेश की ताजपोशी करते हुए उन्हें सीएम बनाया।

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